आम आदमी पार्टी में राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा को लेकर अंदरूनी खींचतान तेज हो गई है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, उन पर भारतीय जनता पार्टी से कथित नजदीकियों के आरोप लगाए जा रहे हैं, जिससे संगठन के भीतर हलचल बढ़ गई है। कभी नेतृत्व के करीबी और अहम रणनीतिकार माने जाने वाले चड्ढा को लेकर अब शीर्ष नेतृत्व सख्त रुख अपनाता नजर आ रहा है। पार्टी की ओर से उन्हें “एहसान फरामोश” तक कहा गया है। साथ ही यह भी कहा गया कि अरविंद केजरीवाल ने उन्हें साधारण पृष्ठभूमि से उठाकर संसद तक पहुंचाया, लेकिन अब उनके रवैये पर सवाल उठ रहे हैं।

हाल ही में पार्टी ने उन्हें राज्यसभा में डिप्टी लीडर पद से हटा दिया था, जिसके बाद से उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चाएं तेज हो गईं। सूत्रों के अनुसार, कथित शराब नीति मामले और पार्टी की रणनीति के दौरान उनकी सक्रियता अपेक्षाकृत कम रही। यहां तक कि केजरीवाल की गिरफ्तारी के समय भी वे अन्य नेताओं की तरह आक्रामक नहीं दिखे। अदालत से राहत मिलने के बाद भी उनकी सीमित प्रतिक्रिया को लेकर पार्टी के भीतर असंतोष देखा गया।

विवाद तब और गहरा गया जब उनकी जगह डिप्टी लीडर बनाए गए अशोक कुमार मित्तल के ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने छापेमारी की। इसके बाद पार्टी ने आरोप लगाया कि इस कार्रवाई के पीछे राघव चड्ढा की भूमिका हो सकती है। पार्टी प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने दावा किया कि चड्ढा की भाजपा नेतृत्व से मुलाकात हुई थी और उन्होंने ही कथित तौर पर मित्तल के खिलाफ ईडी कार्रवाई की मांग की।

प्रियंका कक्कड़ ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि पार्टी ने एक सामान्य परिवार से आए कार्यकर्ता को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया, लेकिन अब उनके व्यवहार से निराशा हुई है। उन्होंने इसे “कृतघ्नता” और “विश्वासघात” जैसे शब्दों से जोड़ते हुए कहा कि चड्ढा का रवैया नेतृत्व के प्रति अपेक्षित सहयोगात्मक नहीं रहा।

इस पूरे विवाद के बीच राघव चड्ढा ने फिलहाल चुप्पी साध रखी है। ताजा आरोपों पर उन्होंने कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। हालांकि, डिप्टी लीडर पद से हटाए जाने के बाद उन्होंने सवाल जरूर उठाए थे कि उनकी गलती क्या थी और क्या आम लोगों की आवाज उठाने के कारण उन्हें पद से हटाया गया। पार्टी के आरोपों और उनकी चुप्पी के बीच यह मामला अब सियासी गलियारों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है।

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