नई दिल्ली, 15 अप्रैल 2026

केंद्र सरकार द्वारा लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करने और संसद व विधानसभाओं में 33% महिला आरक्षण लागू करने के प्रस्ताव पर सियासी और संवैधानिक बहस तेज हो गई है। इन प्रस्तावों से जुड़े तीन विधेयकों को 16 से 18 अप्रैल के बीच संसद के विशेष सत्र में पेश किया जाना है, लेकिन इससे पहले ही विपक्ष और कई राज्यों ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

क्या हैं बड़े प्रस्ताव?

सरकार द्वारा भेजे गए विधेयकों में लोकसभा की अधिकतम सीटें 850 करने का प्रस्ताव है, जिसमें 815 सीटें राज्यों और 35 केंद्र शासित प्रदेशों के लिए होंगी। इसके साथ ही लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक-तिहाई यानी 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान भी शामिल है।

परिसीमन बना विवाद की जड़

इन प्रस्तावों का आधार परिसीमन (डीलिमिटेशन) प्रक्रिया है, जो “ताज़ा जनगणना” के आधार पर सीटों का पुनर्निर्धारण करेगी। फिलहाल 2011 की जनगणना को आधार माना जा रहा है। इसी बिंदु पर सबसे ज्यादा विवाद सामने आया है।

दक्षिणी राज्यों की चिंता

तमिलनाडु, तेलंगाना जैसे दक्षिणी राज्यों ने आशंका जताई है कि जनसंख्या के आधार पर सीटें तय होने से उनका प्रतिनिधित्व कम हो सकता है, जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे अधिक जनसंख्या वाले राज्यों की सीटें बढ़ जाएंगी। इन राज्यों का तर्क है कि परिवार नियोजन में बेहतर प्रदर्शन के बावजूद उन्हें “सजा” मिल सकती है।

महिला आरक्षण पर भी बहस

महिला आरक्षण को लेकर व्यापक सहमति होने के बावजूद इसके लागू होने की प्रक्रिया और समय पर सवाल उठ रहे हैं। पहले इसे जनगणना और परिसीमन से जोड़ा गया था, जिससे इसके लागू होने में देरी की आशंका थी। अब सरकार के नए रुख को लेकर विपक्ष पारदर्शिता की मांग कर रहा है।

विपक्ष का आरोप—चुनावी रणनीति

विपक्षी दलों ने इन विधेयकों के समय पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु चुनाव से पहले यह कदम महिला मतदाताओं को प्रभावित करने की रणनीति हो सकता है। कुछ नेताओं ने इसे “राजनीतिक तुष्टिकरण” करार दिया है।

आगे क्या?

यदि ये विधेयक पारित होते हैं, तो 2029 के आम चुनाव से पहले देश की चुनावी और राजनीतिक संरचना में बड़ा बदलाव संभव है। हालांकि, परिसीमन की अंतिम रूपरेखा आयोग द्वारा तय की जाएगी, जिससे यह स्पष्ट होगा कि राज्यों के बीच सीटों का संतुलन कैसे बनाए रखा जाएगा।

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