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चार दशक की खामोशी टूटी: इंद्रावती टाइगर रिजर्व में लौटी बाघों की दहाड़, अब बनेगा देश का नया वाइल्डलाइफ डेस्टिनेशन

जगदलपुर, 16 जुलाई। बस्तर का इंद्रावती टाइगर रिजर्व, जो कभी नक्सल प्रभाव और सुरक्षा कारणों से देश-दुनिया की नजरों से लगभग ओझल हो गया था, अब नई पहचान की ओर बढ़ रहा है। दशकों तक खामोश पड़े इस घने जंगल में वन्यजीवन की वापसी के स्पष्ट संकेत मिलने लगे हैं। पहली बार यहां वैज्ञानिक तरीके से वन्यजीवों की निगरानी की जा रही है और अब इसे पर्यटकों के लिए विकसित करने की तैयारी भी तेज हो गई है।

करीब 2,799 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला इंद्रावती टाइगर रिजर्व छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और तेलंगाना की सीमाओं से लगा हुआ है। वर्ष 1983 में इसे प्रोजेक्ट टाइगर के तहत संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया था। अंग्रेजों के शासनकाल में यह इलाका शिकार के लिए प्रसिद्ध था, लेकिन पिछले चार दशकों में नक्सली गतिविधियों के चलते यहां वन विभाग की पहुंच भी सीमित हो गई थी। अब सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने के साथ यह क्षेत्र फिर से संरक्षण और ईको-टूरिज्म के केंद्र के रूप में उभर रहा है।

बदलाव की सबसे बड़ी तस्वीर जंगल के भीतर दिखाई दे रही है, जहां पहली बार कोर और बफर जोन में बड़ी संख्या में ट्रैप कैमरे लगाए गए हैं। इन कैमरों में हाल ही में एक बाघिन अपने तीन शावकों के साथ कैद हुई है, जिसने वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञों की उम्मीदों को नई उड़ान दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इंद्रावती टाइगर रिजर्व में पांच से अधिक बाघों की मौजूदगी हो सकती है और अब वैज्ञानिक पद्धति से उनकी सटीक गणना भी संभव हो सकेगी।

वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण सफलता मिली है। हाल ही में अंतरराज्यीय शिकारी गिरोह का खुलासा हुआ, जिसने इसी क्षेत्र में कई बाघों का शिकार किया था। लगातार निगरानी, सुरक्षा बलों की मौजूदगी और वन विभाग की सक्रियता के चलते ऐसे नेटवर्क पर प्रभावी कार्रवाई की गई है, जिससे वन्यजीवों की सुरक्षा और मजबूत हुई है।

वन मंत्री केदार कश्यप ने कहा कि इंद्रावती टाइगर रिजर्व को वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ ईको-टूरिज्म के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। आने वाले समय में यहां देश-विदेश से पर्यटक पहुंचेंगे, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर भी मिलेंगे।

कभी बंदूकों की आवाज से गूंजने वाला इंद्रावती का जंगल अब वन्यजीवों की चहलकदमी और कैमरों में कैद हो रही प्रकृति की नई तस्वीरों के लिए पहचाना जा रहा है। यह बदलाव न केवल बस्तर बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ के लिए उम्मीद और विकास की नई कहानी बनकर सामने आ रहा है।

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